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साहित्य की कसौटी पर इन्टरनेट की रचनाएँ

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कुछ दिन पहले आयोजित ताज साहित्य महोत्सव में इस विषय पर बहुत चर्चा हुई, शायद इसलिए कि साहित्यकार और पुराने साहित्य के पंडित इस इन्टरनेट के जानवर की बहुत अवाजें सुनने लगे हैं - और अक्सर इसकी सड़क छाप भाषा और इसके अनुशासन हीन लेखक साहित्य के पॉलिसियों को परेशान कर रहे हैं। 

पर इस इन्टरनेट साहित्य या साहित्याहीनता को समझने के लिए मुझ जैसे बेलगाम लेखकों के वेब व्यक्तित्व को समझना आवश्यक है।

मुझे ही लीजिये, मैं कवि हूँ और अपनी कविताएँ वेब पर प्रकाशित करता हूँ। इसका अर्थ यह है कि मेरी रचनाएँ धन नहीं बंटोर पाती और साहित्य की, फ़िलहाल, नाजायज़ औलाद हैं। मगर कुछ एक दो लाख लोग, गूगलाते, अमूमन मेरी रचनाएँ पढ़ जाते हैं। सच बड़ा सुख मिलता है उससे। इस बात का विश्वास भी होने लगता है कि शायद सचमुच मैं कवि ही हूँ। इतना कि मैंने अपने जीमेल की आईडी भी अरविन्द जोशी नहीं अरविन्द पोएट रखी है। यही मेरे ट्विटर का हैंडल भी है और फेसबुक का नाम भी।

ये लोग जो मेरी कविता - कहानियाँ पढ़ रहे हैं केवल भारत ही से नहीं, लगभग पच्चीस देशों के हैं। पर मैं यह नहीं जानता कि जब वे ये पढ़ -सुन रहे हैं तो साहित्य पढ़ रहे हैं या 
बस पढ़ रहे हैं।

मतलब? मतलब ये कि इन बातों में कुछ रोचक मूल प्रश्न छिपे हैं, जिनके उत्तर देना मेरा काम नहीं। मैं तो बस इन्टरनेट कवि मात्र हूँ। पर उन प्रश्नों का कुछ विश्लेषण करने का 
प्रयत्न कर सकता हूँ। जैसे क्या मैं और मेरे जैसे बहुतेरे सच में कवि हैं? क्या मैं और मेरे जैसे बहुतेरे, 'अच्छे' कवी हैं? क्या मेरी कविताएँ साहित्य के क्रिकेट में अंतर-राष्ट्रीय न 
सही फर्स्ट क्लास क्रिकेट के ही खिलाड़ी माने जा सकते हैं?

अब पाठकों की संख्या ही अगर साहित्य का माप दंड है, तो मुझ जैसे कीबोर्ड कवियों को तो जल्द ही इस जगत का हीरो नंबर वन माना जाना चाहिए। मेरे कुछ अंग्रेज़ी साहित्य जगत 
के महारथी लेखक मित्र हैं जो हिंदुस्तान में साहित्य के मापक माने जाते हैं किन्तु उनके पाठकों की संख्या हमसे आधी भी न होगी।

फिर इन इन्टरनेट के शब्द -शिल्प्पियों की गणना साहित्यकारों में क्यूँ नहीं हो रही - कम से कम भारत में - और अंग्रेजी को छोड़ अन्य भारतीय भाषाओं में?

मेरी साहित्य और कला की वेबसाइट पर पचास से अधिक लेखक प्रकाशित हैं - ऑस्ट्रेलिया, एशिया, यूरोप और अमेरिका के लेखक। वेब पर इन लेखकों को लाखों ने पढ़ा है, 
पर अगर मैं उन्हीं रचनाओं को किताब के रूप में प्रकाशित करना चाहूँ तो उस 'साहित्य' के प्रकाशन और वितरण के लिए मुझे सरकार से अनुमति लेनी होगी और पंजीकरण करना 
पढ़ेगा। है न रोचक?

जो हमें फिर उस प्रश्न पर पे लाता है कि साहित्य की कसौटी पे वेब की रचनाएँ और रचनाकार क्या हैं ?
ये बात किसी से छिपी नहीं कि आज की सदी में साहित्य के कोई नियम नहीं। ये पोस्ट - मॉडर्न दुनिया है। साहित्य को साहित्य,
सन्दर्भ बनाता है। टेक्स्ट के गिर्द का कॉन्टेक्स्ट, और उसके सामने का पाठक बनाता है, साहित्य। लोक धर्म साहित्य बनाता है।

इतिहास की कोई किताब, कैलेंडर की एक तस्वीर, एक खोई चिट्ठी, एक झूठा लेख - सभी सही सन्दर्भ में, सही समय पर साहित्य हो जाते हैं।

तो फिर एक स्टेटस मेसेज जो हाइकू की शक्ल में हो, या शेर की; एक रोचक कमेंट - विवाद, या एक टूटे ह्रदय से पोस्ट किया गया गीत - सभी साहित्य हो सकते हैं। ज़रुरत है बस सही सन्दर्भ की।

साहित्य को साहित्य की मान्यता मिलने के लिए उसके चारों तरफ़ या तो पाठकों का सागर हो जो ये मानता हो कि वह साहित्य पढ़ रहा है, या फ़िर एक पढने, समझने, विश्लेषण करने की मान्य पद्धति / पद्धतियाँ  हों उससे जुड़ीं जो उसके साहित्य होने का प्रमाण दे और उस साहित्य की प्रतिष्ठा करे।

ये प्रतिष्ठा समय के साथ आएगी भी। आखिर अंग्रेज़ी साहित्य, जो आज वेब और उसके बाहर इतना प्रतिष्ठित है, खुद इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों में बीसवीं शताब्दी में जाकर बतौर साहित्य प्रवेश पा सका। 

पर इन्टरनेट का साहित्य - और इन्टरनेट के साहित्य से मेरा मतलब उस साहित्य से नहीं जो इन्टरनेट में  केवल  प्रकाशित हुआ है  - बल्कि उस साहित्य से है जो इन्टरनेट कि इन्टरनेट के माध्यम से, उसके स्वरुप से अपना स्वरुप लेता हो। उस इन्टरनेट के साहित्य को हमें साहित्य में सम्मिलित करना ही होगा।

क्यूंकि जिस तरह किताबों ने और किताब पाठन की प्रक्रिया ने गीत और महाकाव्यों को कविता और गद्य का स्वरुप दिया, उसी तरह इंटरनेट कई नई तरह के क्षणभंगुर साहित्य की रचना कर रहा है। उस भाषा में और उस वेग से जो हमारे बड़े और छोटे शहरों के जीवन की हैं।

ये भाषा में एक नई स्फूर्ति ला रहा है, उर्जा ला रहा है, कई सीमाएँ तोड़ रहा है। इसमें तीखा व्यंग्य, खुली कामुकता, क्रोध, और राजनैतिक  उफान है। इसमें 'मैं' के नीजी चेहरे के हर परत का खेल है। इसमें जितना जाति, देश, प्रदेश और पहचान की आसक्ती है, उससे कहीं ज्यादा उसकी अवहेलना के लिए स्थान है।

पिंटरेस्ट पर तस्वीरों के रूप में कविताएँ हैं, फेसबुक पर फ़्लैश-फिक्शन और सामुहिक लेखन, ट्विटर पर ट्विटरेचर, जहाँ पुराने गीत, कथाएँ, 140 अक्षरों में संक्षिप्त हो रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी मोबाइल सोशल नेटवर्क एप्लीकेशन रोक्कीटॉक पर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई देशों के शायर लाइव मुशायरे कर रहे हैं। एप्पल और गूगल का प्रयोग करके विश्व भर में लोग एक क्लिक मात्र से ई-बुक प्रकाशित करके वितरित भी कर रहे हैं।

पश्चिम में वेब के साहित्य को पहचानने और प्रतिष्ठित करने के लिए कई बड़े पुरुस्कार हैं। पुशकार्ट अवार्ड्स जिनमें अग्रणीय माना जाता है। नामी हॉलीवुड अभिनेता लीओनार्डो-डी-कैपरीओ ने तो वेब पर ही वेब के विडियो साहित्य के लिए एक फेस्टिवल भी बना रखा है। 

पर भारत में आवश्यक्ता है ऐसे सन्दर्भ की। और अंग्रेजी में नहीं  - क्यूंकि अंग्रेज़ी की रचनाएँ उन वेब अवार्ड के लिए यूँ भी जा सकती हैं - उसकी ज़रुरत है हिंदी में, तमिल में - अन्य भारतीय भाषाओं में।

इस वेब साहित्य का असर हमारी भाषा और हमारे वेब के बाहर के साहित्य पर पड़ रहा है - इसे हम नकार नहीं सकते। असर ठीक उसी तरह जैसे लोक परम्पराओं का पड़ता है, जहाँ अचानक एक चुटकुला, एक गीत, बोलने का एक लहज़ा आम होने लगता है। पर ये कहना कठिन है कि कब और कैसे, क्योंकि ये एनोनिमस या गुमनाम होते हैं। ठीक उसी प्रकार वेब की साहित्य क्षणिकाएँ भी अस्थिर अणुओं की तरह, व्यक्ति - व्यक्ति, शहर शहर, संचारित होती हैं, पर यह जानना कठिन है कि वो शुरू कहाँ से हुई, उसका लेखक कौन था।

आज से करीब दस वर्ष पूर्व ज़िग्मुंड बाउमन नाम के समाजशास्त्री, विचारक और दार्शनिक की एक किताब आई थी जिसका नाम था - 'लिक्विड मॉडर्निटी', जिसमें उन्होंने एक 'तरल आधुनिकता ' की बात की थी। तरल इसलिए कि वह क्षणभंगुर है और चलायमान भी, उसका कोई एक स्वरुप नहीं। हम आधुनिक खानाबदोश उसी तरलता में जीते हैं। हमारे अस्थिर जीवन, सम्बन्ध, सार्वजनिक देह और मन के हजारों स्वरुप इसी आधुनिकता की है। इस तरल आधुनिकता का माध्यम है वेब या इन्टरनेट, और उस इन्टरनेट का साहित्य, किसी भी और साहित्य से अधिक इस तरल आधुनिकता का प्रतीक भी है और उसे व्यक्त भी करता है।
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